CRIME BORDER | 25 January 2026 | 05:05 PM
आज भारत जिस सबसे गंभीर सामाजिक संकट से जूझ रहा है, वह है नशे की बढ़ती लत। नशा केवल व्यक्ति की सेहत को नहीं, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र की नींव को कमजोर करता है। युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति देश के भविष्य पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। ऐसे में “नशा मुक्त भारत” केवल नारा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संकल्प बनना चाहिए।
नशे की लत का दायरा अब केवल शहरों तक सीमित नहीं रहा। गांव, कस्बे, मजदूर वर्ग और यहां तक कि छात्र भी इसकी चपेट में हैं। शराब, ड्रग्स, तंबाकू और सिंथेटिक नशे अपराध, घरेलू हिंसा, सड़क दुर्घटनाओं और मानसिक बीमारियों को जन्म दे रहे हैं। नशे की गिरफ्त में आया व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी जिम्मेदारियों से कट जाता है और समाज पर बोझ बन जाता है।
सरकार द्वारा नशा मुक्ति अभियान, कानून और योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन केवल कानून से यह समस्या समाप्त नहीं होगी। इसके लिए सामाजिक सहभागिता अनिवार्य है। परिवार को पहली जिम्मेदारी निभानी होगी—बच्चों से संवाद, संस्कार और समय देना होगा। शैक्षणिक संस्थानों में जागरूकता कार्यक्रम, खेल और रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देना जरूरी है।
मीडिया और सामाजिक संस्थाओं की भूमिका भी अहम है। नशे के खिलाफ निरंतर जनजागरण, सफल नशा मुक्ति की कहानियां और पीड़ितों के पुनर्वास पर ध्यान देना समय की मांग है। नशा करने वाले को अपराधी नहीं, बल्कि मरीज मानकर इलाज और पुनर्वास की दिशा में प्रयास होने चाहिए।
यदि भारत को सचमुच विकसित राष्ट्र बनाना है, तो उसके नागरिकों का स्वस्थ, जागरूक और नशा मुक्त होना अनिवार्य है। नशा मुक्त भारत ही सशक्त, सुरक्षित और समृद्ध भारत की नींव रख सकता है।
लेखन :- संपादक : राजेंद्र वखरे
छायाचित्र : Mr. N Nyemang ,Poster Making Competition Organised by Nasha Mukt Mon Nagaland