Editorial Desk • 20 Dec 2025
भारत में महिलाओं की सुरक्षा लंबे समय से एक गंभीर मुद्दा रही है। पिछले दशक में कई कड़े कानून बनाए गए, फास्ट-ट्रैक कोर्ट स्थापित किए गए और जागरूकता अभियान चलाए गए। इसके बावजूद महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आंकड़े चिंताजनक बने हुए हैं।
समस्या केवल कानून की कमी नहीं है, बल्कि सामाजिक मानसिकता में भी बदलाव की जरूरत है। कई मामलों में पीड़ित महिलाओं को न्याय मिलने में देरी होती है, जिससे अपराधियों के हौसले बढ़ जाते हैं। पुलिस तंत्र पर भी संसाधनों और संवेदनशीलता की कमी के आरोप लगते रहे हैं।
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की चुनौतियां अलग-अलग हैं, लेकिन असुरक्षा की भावना समान है। कार्यस्थलों पर उत्पीड़न, सार्वजनिक स्थानों पर छेड़छाड़ और घरेलू हिंसा जैसे मुद्दे अभी भी व्यापक हैं।
समाधान केवल कानून बनाने से नहीं आएगा। शिक्षा, जागरूकता और सामाजिक सोच में बदलाव आवश्यक है। पुरुषों और महिलाओं दोनों को समानता और सम्मान की भावना सिखाना जरूरी है।
जब तक समाज महिलाओं की सुरक्षा को अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगा, तब तक केवल कानून से बदलाव संभव नहीं है।